सम्पूर्ण मानुष जाति के लिये संदेश
प्रिय मानव समाज आप लोग जानतें ही हैं कि इस संसार में सृष्टि का अद्वितीय श्रेष्ठतम कृतीमनुष्य योनि है। परम पिता परमात्मा ने हमें मानव रूप प्रदान कर समस्त जीवों में श्रेष्ठ सर्वोत्तम मानसिक शक्ती प्रदान किया है। इसलिये हम उस सर्वशक्तिमान सृष्टि कर्ता एवं उसके दूत पुत्रों की पूजा करता है। सृष्टिकर्ता परम शक्ती के द्वारा सम्पूर्ण जगत और प्राणियों का सृजन किया गया है। इस पृथ्वी एयर पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी उसी की कृपा मात्र से विचरण करते हुए अपना जीवन निर्वाह के लिये कर्म करतें हैं। हम सब मानव भी उसी सृष्टि की एक अद्वितीय उपादान है। जो इस संसार में कर्म करते हुए जीवन बसर करतें हैं। समस्त जीवधारियों का सृष्टि कर्ता ईश्वर होता है परंतु कुछ वस्तुएं प्रकृति के द्वारा निर्मित हैं, और कुछ वस्तुएं मानव निर्मित होतं हैं। एस प्रकार प्रकृति एवं परम शक्ती ईश्वर के द्वारा यह संसार निर्मित है। ईश्वर के द्वारा बनाए गए सृजन सजीव होते हैं। प्रकृति तथा मानव निर्मित वस्तुएं निर्मित होते हैं सृजन कर्ता तो सृजन कर्ता ही कहलाएगा चाहे वह जीवित सृजन करे या निर्जीव का इस प्रकार सृजन कर्ता का स्थान बडा ही होता है तथा पूजनीय होता है। ईश्वर जीवित वस्तु स्वेदज, अण्डज, पिण्डाज और ऊदभिज को निर्मित करता है। इन चारो जीवधारियों को बनाकर अपनी अद्वितीय कृती प्रस्तूत करता है और महानता को प्रदर्शित करता है। मानव भी कुछ कम नहीं है ईश्वर से आगे निकलने की होड़ में उन परमशक्ती, अदृश्य, देवी देवताओं को बना लेता है जो हमें दिखाई नहीं देते। यह विचारणीय तथ्य है कि जिसे हमने कभी देखा ही नहीं उन देवी देवताओं की मुर्ति बनाकर देवालयों में स्थापित कर लेता है। हम यह भी मानने लगतें हैं कि ये मानव निर्मित देवी देवता पूजा मांगतें हैं। पूजा के अंतर्गत बली चाहतें हैं। हम एक मनगढ़त धारणा बना लेते हैं कि यह देवी देवता खुन, मांस तथा मंदीरा अर्पण करने से प्रसन्न होकर हमें वरदान देंगे। यह सोचने की बात है यदि वे देवी देवता भी होते तो वे बलिपूजा की माँग किस प्रकार कैसे करेंगे। हम आज अपना वजुद भूलकर देवी देवताओं को बनाने में लगे है। मात्र सिन्दूर लगा देने से कोई पत्थर देवी देवता नही बन जाता । देवी देवता तो सृष्टि एवं हमारे विधाता है अर्थात उन्होनें इस संसार में हमें जन्म दिया है। इस कारन वह सम्पुर्ण सृष्टि के पिता और हम सब उनके पुत्र हैं। कोई माता पिता अपने ही संतानों की बली माँग सकता है क्या ? वे अपने पुत्रों की हत्या से प्रसन्न हो सकते हैं क्या ? हमें इन प्रश्नों के सर्व समस्त जवाब चाहिये। इसलिये हमें इस पर गहराई से विचार करना होगा।
मनुष्य अपने स्वार्थ साधने के लिये निहिर एवं मासूम जीव जन्तुओं की बली देता है। सभी मानवों से निवेदन है कि बली प्रथा का त्याग करें क्योंकि वे भी ईश्वर के द्वारा बनाया गया है हम अपने आस पास देखते हैं कि बहुत विशाल बडे छोटे मन्दिर देवालय स्थापित है जहाँ मन्दिरों में बली का अर्थ किसी निरीह प्राणी की हत्या करना नहीं है, बल्कि हमारे अपने शरीर और मन में लिप्त स्वार्थ की भावनाओं जैसे काम , क्रोध , लोभ, मोह, हिंसा, तथा अहंकार रुपी बुराइयों को मारकर अर्पण करने से है। समस्त मानव धर्मों में सत्य और अहिंसा पर ही विशेष बल दिया है। जैसे इस्लाम धर्म में ईमान , ईसाई धर्म में दृथ ( सत्य ) जैन,बौद्ध,सिख धर्म में सत्य , अहिंसा। अहिंसा परमों धर्म को आधार मानकर सभी धर्मों के अनुयायी अपने ईष्ट की पूजा करते है। ऐसा कोई भी धर्म नहीं जो जीव हत्या के लिये प्रेरित करता है। जो धर्म सभी जीवों के प्रति दया भाव रखने की सिख नहीं देता बल्कि जीव हत्या के लिये प्रेरित करता हो वह मानव धर्म धर्म कदापि नहीं हो सकता। इस प्रकार सम्पुर्ण सृष्टि को अपना परिवार समझने वाला मानव धर्म जो सभी प्राणियों पर दया भाव रखकर अहिंसा का पालन करने के लिये प्रेरित करता हो वहीं मानव धर्म हो सकता है। ऐसा ही एक सनातन धर्म है सतनाम धर्म, सतनाम ही एक सनातन धर्म है जो कभी किसी जीव की बली नहीं मांगता ।
