किमत बढ़ता ही जा रहा.....या जज्बात की || छत्तीसगढ़ी कविता || नवा बिहनिहा कविता ||

 

किमत बढ़ता ही जा रहा ( नवा बिहनिहा कविता )


किमत बढ़ता ही जा रहा.....या जज्बात की || छत्तीसगढ़ी कविता || नवा बिहनिहा कविता ||


लेखक- अनिल बघेल…...✍

किमत बढ़ता ही जा रहा, 

चाहे इन्शान की हो या अनाज की।


          इन्शानीयत की नाम मिटता जा रहा, 

          चाहे गरीब हो या जज्बात की।


यह कैसा दिन है रे आया, 

यह कैसा युग है रे आया।


          बढ़ता ही चलता जा रहा, 

          बस लालचों का सांया।


मां का प्यार छोड़ दिया, 

पिता के संस्कार भुल गये।


          जो कहते थे मां-बाप भगवान है मेरे, 

          वह ना जाने कैसे फिजूल गये।


जिवन का पाठ पढ़ाया रे इन्शान, 

वह मां-बाप ही थे जो पहचान दिए।


          ना सुकून से तू जीने दिया उसे, 

          जो तेरे लिये क्या-क्या नहीं किए।


मन की लालच को मार दे परिंदे, 

अभी वक्त है इन्शानीयत मे लौट जा।


          मां-बाप ही है तेरे ईश्वर, अल्ला, दाता, 

          तू खुद को कुछ अच्छा करने की दे वजह।


ना कोई दुख में साथ देगा, 

मां-बाप ही है जो आवाज देगा।


          ढूंढ कर देख कंही पर और कोई ऐसा इन्शान, 

          जो जीवन भर तेरा साथ देगा।


और किमत बढ़ता ही जा रहा, 

चाहे इन्शान की हो या अनाज की।


          इन्शानीयत की नाम मिटता जा रहा, 

          चाहे गरीब हो या जज्बात की।





_____Published by Nava Bihaniha_____


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