कैसे भुल रहे हो ( छत्तीसगढ़ी कविता )
सत धर्म की कर्म, कैसे भुल रहे हो।
आन कर्म की रीती रीवाज से झूला कैसे झूल रहे हो।।
सतनाम धर्म हमारा है, कहने से कुछ होता नहीं।
धर्म में जब अडिग रहोगे, तभी धर्म पनपेगी सहीं।।
क्या हो गया तुम सबको, हांथ में आपन धोवत हो।
आये सुनहरा अवसर ल, अपन हांथ में खोवत हो।।
अब तो जागो मेरे सन्तो, सब लोग जागत है।
अजी पशु तो नहीं हो, जो पुछ उठाकर भागत हो।।
क्या हो गया तुम सबको, अभी ल खुलत नईये नॉलेज।
अब पढ़ लिख कर, निकल गये हो B.A., M.A. कालेज।।
Tags:
छत्तीसगढ़ी कविता

