एक बीज के भीतर गुपचुप मिट्टी के तह में कुछ नीचे | बारहमासी लगन (कविता) |

 बारहमासी लगन ( छत्तीसगढ़ी कविता )

एक बीज के भीतर गुपचुप मिट्टी के तह में कुछ नीचे।
नन्हा-नन्हा प्यारा पौधा पड़ा हुआ था आंखे मीचे।।

एक बीज के भीतर गुपचुप मिट्टी के तह में कुछ नीचे | बारहमासी लगन (कविता) |



आषाढ़:- प्रथम मास आषाढ़ आया, आसा धरि जीव गर्भ समाया।

          आश आड़ जीव बाहर आया, धाम छोड़ जीव अति दुख पाया।।

तरुण अवस्था आवन लागी, मन तरंग अब क्षण-क्षण जागी।

चाह उठी तब हुई सगाई, ब्याह हुआ घर नारी आई।।

          माता-पिता का हक सब भले, सतकर्म छोड़ माया संग झूले।

          सठ समान भई गति अपनी, धन की सुमरनी धनकी जपनी।।

काल कलेश बहु वर्षन लागे, वर्षा ऋतु आषाढ़ अब भागे।

अज्ञान अंधेरा अति घट छगे, सयय आया पर अवसर गंवागे।।


सावन:- गरजे बादल चमके बिजुरा, सावन आया मास दुसरा।

          गुरु कड़िहारा शब्द अघारा, सुमरि-सुमरि न जिवन पारा।।

वर्षा ज्यादा वदी बौराई, जस अपजस संग बोहाई।

गुरु भक्ती जस यह गति पाई, अकह अलख शब्द सुनाई।।

          जलचर, नभचर, थलचर नाना, हरा भरा सब जीव जहाना।

          धन्य भाग हम सतगुरु जाना, सावन सतगुरु शब्द बखाना।।

सावन आया नित झुमके, तन मन शीतल होय।

उखमज आया वसुंधरा में, चराचर आनंद होय।।


भादो:- भादो मास तीसरा जारी, लागी सब जग को प्यारी।

          ज्ञान वैराग-भक्ती नहीं धारी, मोह माया हंकारा द्वारी।।

काम क्रोध भरमत न अस लोके, जड़ चेतन की गांठ न खोले।

सतसंग करत न सतसंग सेवा, भाव भक्ती में मन नहि देवा।।

          कर्म भार सिर उपर लादा, घेरे फिरे काल कर फांदा।

          कृषि निवारहि चतुर किसाना, बहै नदी मोह मेद पाना।।

संत दया सतगुरु कृपा, पाया आदि नाद।

धुन पाया आकाश कृपा, फिर खोजत गुरु पाद।।


कुंवार:-  क्ंवार महीना चौथा आया, जीव भवसागर न पार लगाया।

          काम, क्रोध, मद, लोभ सताया, उलट-पुलट आग लगाया।।

आत्मा जाप परमात्मा परखे, शब्द पकड़ सतनाम निरखे।

भव मारग का भेद बताउं, आंख खुले तो भेद लखाऊं।।

          स्वाति बदरिया अंदर बरसे, गुरुनाम जसमन हरसे।

          शरद चंद्रमा अंतर दरसे, गुरु बिना नाम कौन परसे।।

क्या ढूंढे यह बाजार में, क्या ढूंढे यह बस्ती।

तौल लिए हजार में, अपने-अपने यह मस्ती।।


कार्तिक:- कार्तिक मास पांचवा चला, आदि शब्द गुरु चेला मिला।

          भंवर गुफा जब द्वार खोला, सतपुरष तब बानी बोला।।

पाया आत्म पद अति भारी, लखाई शब्द नाम सन्भारी।

गुरु का अगम रूप देखा, सतपुरष सतनाम सम पेखा।।

          ईष्ट सुमिरन मन हुलसाना, गगन मंडल धुन गरज छिपाना।

          शब्द गुरु का पाया ज्ञान, उज्ज्वल शरीर कार्तिक स्नाना।।

निरख नाम पाया मोती, जहां गरज दिखे ज्योति।

आलस नींद खोती, कातिक मास बरै घर ज्योति।।


अगहन:- छठवा मास अगहन आई, अधर्म पाप सब गए नसाई।

          कृषि बटोरे चतुर किसाना, जैसे संत जन बटोरे ज्ञाना।।

मन और सूरज चेत कर जागी, मिलै शब्द गुरु में लागी।

दूर न जानों सतगुरु पासा, निशदिन करो चरन विश्वासा।।

         सहज योग गुरु दिये बताई, सुरति शब्द मारग लखाई।

         अनुभव से वह जानी जाई, शब्द बिना अनुभव नहिं पाई।।

कृषि बटोरे संत मति, सुख शान्ति पावै सब भांति।

नाम धन पाया गुरु प्रीति, शब्द हृदय बसै सब रीती।।


पुष:- पूष मास अति जाड़ा जाना, कर्म मर्म के फूस जलाना।

         काम क्रोध राख मद पाना, परसी पवन संग उड़ाना ।।

बिना शब्द अनुभव नहीं होई, अनुभव बिना समझे नहीं कोई।

सतनाम चादर इक लोई, कोहम शब्द शीत हर लेई।।

          शब्द मिलै कोअम प्रकाशा, जा घट में सतपुरष निवासा।

          सतनाम जे करी विश्वासा, ताकर देह करत प्रकाशा।।

सतनाम बीज अंकुर रहे, होय भक्त पेड़ समान।

मधुर फल ज्ञान रस भरे, खाय संत सबै जहान।।


मांघ:- माघ मास मांगत मंगनी, धरा नभ मिल बोले बानी।

          हंस हंसनी नाचे, गावै तूर तमूरा अधिक बजावै।।

दुल्हा-दुल्हन दोउ बैठाए, भांवर फेरे दोउ गठियाए।

ब्याह भया निज धाम आए, सतपुरष का ध्यान लगाए।।

          ओहम-सोहम जड़ित इक ताला, रतन बीच परे बेहाला।

          पवन अग्नि जोहम रसाला, तामे जीव भये निराला।।

धोय-धोय हो गई मैली, तीन गुण निर्मल फैली।

सत शब्द नाम है शैली, बनी मिलत इक पैली।।


फागुन:- फागुन मास रंगीला आया, धूम धाम जग में फैलाया।

          घर-घर शब्द सतनाम गाया, झांझ मंजीरा मृदंग बजाया।।

मन इंद्रिया संग खेलिन फाग, उत से सोई मन गई जाग।

दोउ मिल संजोग मिलापा, गुरु श्रवन शब्द लखाया।।

          नाम-पान माला गल फांसी, देखि-देखि अनजान हांसी।

          चरन प्रताप सरन में आई, तब सतगुरु मन समझाई।।

तीन तत्व इक पिण्ड सम, देह रूप लेई ठान।

तीन मिलै इक जीव सम, हंस रूप लेहि पहचान।।


चईत:- चैत महीना आया सेत, सेत वसन तन चंदन सेत।

          पांच नाम परवाना देत, सबै संत परसादी लेत।।

गुरु चरण झुकाओ माथ, शिष्य उतारे गहि कर हाथ।

भवसागर गहिल गंभीरा, उतरे पार संत मति धीरा।।

          शब्द सुना जे धुन ओंकारा, अलख प्रकाशा सोय निहारा।

          आदि न अंत अनंत अपारा, सतनाम जाप करै दरकारा।।

नाव बनाई शब्द की, चढ़ बैठे सो संत।

सार नाम है शब्द की, आदि है न अंत।।


बईसाख:- बैसाख मास सब जीव अधीना, शब्द पुरुष है इक नगीना।

          तीन लोक काल का थाना, चौथा लोक गुरु अस्थाना।।

आपहु राम, आपहु रावन, आपहु कंस आप जसु नंदन।

काल किया सब बागान घेरी, करहु सतनाम शब्द की फेरि।।

          नहि पाताल नाहिं आकाशा, पांच तत्व गहि निरगुन श्वासा।

          वेद पुरान कुरान न गाई, जोगी ज्ञानी खोज न पाई।।

मुसलमान हिन्दू कोई नहिं, जैन, ईसाई न कोय।

स्वर्ग नर्क देखा नहिं,मां-बाप चरण सब होय।।


जेठ:- जेठ महीना अगिनकर ठेठा, संत जन सिर बांधे उं फेटा।

          इक वृक्ष इक पान कर डेटा, माता-पिता के इक बेटा।।

हम ही गुरु, हम ही चेला, हमरे बीच में पेलिक-पेला।

नहिं पढ़े अक्षर सत ज्ञाना, हमी बनारस पोथी पुराना।।

          हांड़ मास सब इक है, लहु बरन है लाल।

          भुल-चूक माफ करी है, रत्नाकर रतनलाल (लेखक)

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